सम्राटअशोक की जीवनी : Samrat Ashoka History
संसार के इतिहास में केवल 3 राजाओं को ही उनके नाम के साथ ‘महान’ कहकर सम्भोदित किया जाता है एक अलेक्जेंडर दुसरे अकबर और हमारे अपने महान समराट अशोका
भारत का सम्पूर्ण इतिहास विदेशिओं द्वारा हारने का इतिहास है केवल बौध मत के रहा अशोक ही एक्मात्र ऐसे मूल भारतीय राजा हुए जिन्होंने सरे हुन्दुस्तान समेत आज का नेपाल बांग्लादेश पाकिस्तान और अफगानिस्तान अदि को एक देश और एक झंडे के नीचे जीत लिए थे। केवल जीता ही नहीं बल्कि अपनी प्रजा को अपने बच्चों के समान प्रेम किया और बेहतरीन सुशाशन दिया जिसकी याद में आज भी हमारा रास्ट्र चिन्ह अशोक स्थंभ और झंडे पर अशोक चक्र है । संसार के इतिहास में केवल 3 राजाओं को ही उनके नाम के साथ ‘महान’ कहकर सम्भोदित किया जाता है एक अलेक्जेंडर दुसरे अकबर और हमारे अपने महान समराट अशोक सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में अशोक गौतम बुद्ध के भक्त हो गए और उन्हीं (महात्मा बुद्ध) की स्मृति में उन्होंने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल-लुम्बिनी में मायादेवी मन्दिर के पास अशोक स्तम्भ के रूप में देखा जा सकता है। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया। अशोक के अभिलेखों में प्रजा के प्रति कल्याणकारी द्रष्टिकोण की अभिव्यक्ति की गई है।
सम्राट अशोक- द ग्रेट मौर्य साम्राज्य (322-185 ईसा पूर्व) के तीसरे राजा था, जो युद्ध के अपने त्याग, धम्म की अवधारणा के विकास (पवित्र सामाजिक आचरण) और बौद्ध धर्म के प्रचार के रूप में जाना जाता था। इसके साथ ही अखिल भारतीय राजनीतिक इकाई का उनका प्रभावी शासनकाल रहा। सम्राट अशोक के अनुसार, मौर्य साम्राज्य आधुनिक भारतीय ईरान से भारतीय उपमहाद्वीप के लगभग पूरे क्षेत्र तक फैली हुई थी। म्राट अशोक को चन्द्रगुप्त के अधीन काम करने वाले प्रधान मंत्री चाणक्य (जिसे कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है।
सम्राट अशोक का अर्थ है “बिना दुःख के” जो उनके दिए गए नाम की सबसे अधिक संभावना थी। उनका जन्म 304 ई. पू में पाटलिपुत्र में हुआ था। उनके पिता और माता का नाम बिन्दुसार एवं सुभद्रांगी था। उनके बारे में कहा जाता है कि वे अपने शासनकाल में विशेष रूप से निर्मम थे, जब तक कि उन्होंने कलिंग साम्राज्य के खिलाफ अभियान नहीं चलाया। 260 ईसा पूर्व, जिसके परिणामस्वरूप ऐसी नरसंहार, विनाश और मृत्यु हुई कि सम्राट अशोक ने युद्ध का त्याग किया और समय के साथ, बौद्ध धर्म में परिवर्तित हो गया। अपने आप को धम्म की अवधारणा में उदाहरण के रूप में शांति के लिए समर्पित कर दिया। सम्राट अशोक की मृत्यु 238 ई पूर्व हुई थी।
उनकी जन्मतिथि अज्ञात है, और कहा जाता है कि वह अपने पिता बिंदुसार के सौ पुत्रों में से एक थे। उनकी माता का नाम एक पाठ में सुभद्रांगी के रूप में दिया गया है। बिन्दुसार के 100 पुत्रों की कहानी को अधिकांश विद्वानों ने खारिज कर दिया है, जो मानते हैं कि सम्राट अशोक चार में से दूसरा पुत्र था। उनके बड़े भाई, सुसीमा, वारिस स्पष्ट और ताज राजकुमार थे और सम्राट अशोक की कभी भी सत्ता संभालने की संभावना इतनी कम और यहां तक कि पतली थी क्योंकि उनके पिता ने उन्हें नापसंद किया था।
उन्हें उच्च शिक्षित किया गया था, मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित किया गया था। भले ही उन्हें सिंहासन के लिए उम्मीदवार नहीं माना जाता था – वे बस शाही बेटों में से एक के रूप में। द आर्टशास्त्र समाज से संबंधित कई अलग-अलग विषयों को कवर करने वाला एक ग्रंथ है, लेकिन मुख्य रूप से, राजनीतिक विज्ञान पर एक मैनुअल है जो प्रभावी ढंग से शासन करने के लिए निर्देश प्रदान करता है। इसका श्रेय चंद्रगुप्त के प्रधान मंत्री चाणक्य को दिया जाता है, जिन्होंने चंद्रगुप्त को राजा बनने के लिए चुना और प्रशिक्षित किया। जब चंद्रगुप्त ने बिंदुसार के पक्ष में त्याग दिया, तो कहा जाता है कि बाद में उन्हें अर्थशास्त्री के रूप में प्रशिक्षित किया गया था और इसलिए, निश्चित रूप से उनके बेटे होंगे।
जब सम्राट अशोक 18 वर्ष की आयु के आसपास थे, तो उन्हें विद्रोह करने के लिए पाटलिपुत्र की राजधानी से तक्षशिला भेजा गया था। एक किंवदंती के अनुसार, बिन्दुसार ने अपने बेटे को एक सेना प्रदान की लेकिन कोई हथियार नहीं; हथियार अलौकिक साधनों द्वारा बाद में प्रदान किए गए थे। इसी किंवदंती का दावा है कि सम्राट अशोक उन लोगों के लिए दयालु था जो उसके आगमन पर अपनी बाहें बिछाते थे।
अशोक स्तंभ और बौद्ध स्तूप
अशोक महान ने जहां-जहां भी अपना साम्राज्य स्थापित किया, वहां-वहां अशोक स्तंभ बनवाए। उनके हजारों स्तंभों को मध्यकाल के मुस्लिमों ने ध्वस्त कर दिया। इसके अलावा उन्होंने हजारों बौद्ध स्तूपों का निर्माण भी करवाया था। अपने धर्मलेखों के स्तंभ आदि पर अंकन के लिए उन्होंने ब्राह्मी और खरोष्ठी दो लिपियों का उपयोग किया था। कहते हैं कि उन्होंने तीन वर्ष के अंतर्गत 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया था।
कलिंग युद्ध का इतिहास History of Kalinga War
भारतीय इतिहास में कलिंग के युद्ध का एक प्रमुख स्थान है इस युद्ध में सबसे ज्यादा खून खराबा हुआ था। यह युद्ध महान मौर्य सम्राट अशोक और राजा अनंत पद्मनाभन के बीच 262 ईसा पूर्व में कलिंग (जो आज ओडिशा राज्य है) लड़ा गया था। अशोक ने युद्ध में राजा अनंत पद्मनाभन को पराजित किया, जिसके परिणामस्वरूप कलिंग पर विजय प्राप्त की और मौर्य साम्राज्य में इसको मिला लिया। इस युद्ध के परिणाम विनाशकारी थे मौर्य सम्राट अशोक ने अंततः शांति का मार्ग चुना और बौद्ध धर्म को अपनाया।
हृदय परिवर्तन
कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार तथा विजित देश की जनता के कष्ट से अशोक की अंतरात्मा को तीव्र आघात पहुँचा। युद्ध की भीषणता का अशोक पर गहरा प्रभाव पड़ा। अशोक ने युद्ध की नीति को सदा के लिए त्याग दिया और ‘दिग्विजय’ के स्थान पर ‘धम्म विजय’ की नीति को अपनाया। डा. हेमचंद्र रायचौधरी के अनुसार मगध का सम्राट बनने के बाद यह अशोक का प्रथम तथा अन्तिम युद्ध था। इसके बाद मगध की विजयों तथा राज्य-विस्तार का यह युग समाप्त हुआ जिसका सूत्रपात बिंबिसार की अंग विजय के बाद हुआ था। अब एक नए युग आरम्भ हुआ। यह युग शान्ति, सामाजिक प्रगति तथा धर्मप्रचार का था, किन्तु इसके साथ-साथ राजनीतिक गतिरोध और सामरिक कुशलता भी दिखाई देने लगी। सैनिक अभ्यास के अभाव में मगध का सामरिक आवेश और उत्साह क्षीण होने लगा।
कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार तथा विजित देश की जनता के कष्ट ने अशोक की अंतरात्मा को झकझोर दिया। सबसे अंत में अशोक ने कलिंगवासियों पर आक्रमण किया और उन्हें पूरी तरह कुचलकर रख दिया। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ के अनुसार अशोक के इष्टदेव शिव थे, लेकिन अशोक युद्ध के बाद अब शांति और मोक्ष चाहते थे और उस काल में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था। युद्ध की विनाशलीला ने सम्राट को शोकाकुल बना दिया और वह प्रायश्चित करने के प्रयत्न में बौद्ध विचारधारा की ओर आकर्षित हुआ। अशोक महान ने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया।
Samrat Ashoka की मृत्यु कैसे हुई
अशोक ने लगभग 40 वर्षों तक शासन किया जिसके बाद लगभग 234 ईसापूर्व में उसकी मृत्यु हुई। उसके कई संतान तथा पत्नियां थीं पर उनके बारे में अधिक पता नहीं है। उसके पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा ने बौद्ध धर्म के प्रचार में योगदान दिया।
अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य राजवंश लगभग 50 वर्षों तक चला।
मगध तथा भारतीय उपमहाद्वीप में कई जगहों पर उसके अवशेष मिले हैं। पटना (पाटलिपुत्र) के पास कुम्हरार में अशोककालीन अवशेष मिले हैं। लुम्बिनी में भी अशोक स्तंभ देखा जा सकता है। कर्नाटक के कई स्थानों पर उसके धर्मोपदेशों के शिलोत्कीर्ण अभिलेख मिले हैं।
मगध साम्राज्य के महान मौर्य सम्राट अशोक की मृत्यु २३७-२३६ ई. पू. में (लगभग) हुई थी। अशोक के उपरान्त अगले पाँच दशक तक उनके निर्बल उत्तराधिकारी शासन संचालित करते रहे।



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