नागवंश - बुद्ध के उपासक नागवंशयों का इतिहास

शेषनाग कोई साप या प्राणी ना होकर एक इसांनी वंश था ""नागवंश "" नाग को एक प्रतिक चिन्ह के रूप में शिल्पांकनो में प्रस्तुत किया गया था :-- जो हमें समझना चाहिए

दूसरी शताब्दी के मध्य से लेकर चौथी शताब्दी के मध्य तक जिसे इतिहासकारों ने #डार्क_एज कहा है, वह वस्तुतः नाग साम्राज्य का इतिहास है। नागवंशीय नागराजा राजवंश घरानों का धम्म प्रतीक चिह्न (टोटेम) है, नाग, शेषनाग, पञ्चमुखी नाग, सप्तमुखी नाग, भुजंग, डैगन होने के कारण नागवंशी कहलाए। साक्य & नागवंशी राजघराणों का साम्राज्य हिमालय के उस पार से लेकर बांग्लादेश-पाकिस्तान अफगाणिस्तान तक फैला था! उस दौरान उन्होंने भारत के बाहर भी कई स्थानों पर अपनी विजय पताकाएं फहराई थीं।

विशेष तौर पर कैलाश पर्वत से सटे हुए इलाकों जैसा जम्मू-कश्मीर से असम, मणिपुर, नागालैंड तक इनका प्रभुत्व था। तिब्बत तक था, तिब्बती भी अपनी भाषा को 'नागभाषा' कहते हैं।

नाग वंश में एक से बढ़कर एक राजा हुए 

1. मूलचिंद नागराजा छठी शताब्दी ईसा पूर्व।
2. अनंतनाग नागराजा ( 110 ई.पू. ) अनंतनाग नागराजा को ही शेषनाग उपाधि से जाना जाता है।
a) भोगिन नागराजा
b) चंद्राशु नागराजा
c) धम्मवर्म्मन नागराजा
d) वंगर नागराजा

3.वासुकी नागराजा, 
4. तक्षक नागराजा, 
5. करकोटक(कर्कोटक) नागराजा  
6. ऐरावत नागराजा,
7. मगध साम्राज्य शिशुनाग,
8. वीरसेन नाग, 
9. नरदेव नाग,
10. भव नाग, 
11. गणपति नाग,
अनंतनाग, वासुकी, तक्षक और पिंगल वंश ने अपने वंश कुल चलाए।

बुद्ध की अरिय समण धम्म संस्कृती अनुसार जो पर्याप्त धम्म ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं उसके अनुसार 

1. मुचलिंद नागवंशी नागराजा छठी शताब्दी ईसा पूर्व,
2. शेषनाग का पूरा नाम शेषदात नाग था। उनके पूरे नाम की जानकारी हमें ब्रिटिश म्यूजियम में रखे सिक्कों से मिलती है। शेषनाग ने विदिशा को राजधानी बनाकर 110 ई.पू. में शेषनाग वंश की नींव डाली थी। शेषनाग की मृत्यु 20 सालों तक शासन करने के बाद 90 ई. पू. में हुई। उसके बाद उनके पुत्र भोगिन राजा हुए, जिनका शासन – काल 90 ई. पू. से 80 ई. पू. तक था। फिर चंद्राशु ( 80 ई. पू. – 50 ई. पू. ) , तब धम्मवर्म्मन ( 50 ई. पू. – 40 ई. पू. ) और आखिर में वंगर ( 40 ई. पू. – 31ई. पू. ) ने शेषनाग वंश की बागडोर संभाली। शेषनाग की चौथी पीढ़ी में वंगर थे। इस प्रकार शेषनाग वंश के कुल मिलाकर पाँच राजाओं ने कुल 80 सालों तक शासन किए।इन्हीं पाँच नाग राजाओं को पंचमुखी नाग के रूप में बतौर बुद्ध के रक्षक कन्हेरी की गुफाओं में दिखाया गया है। जिन बुद्ध की प्रतिमाओं के रक्षक सातमुखी नाग हैं, वे पंचमुखी नाग वाली प्रतिमाओं से कोई 350 साल बाद की हैं।


नागपंचमी ये त्योहार दरअसल उन पाँच महान पराक्रमी नागवंशी राजाओं की याद मे मनाया जाता था जिन्होने बुद्ध संदेश का प्रसार भारत व भारत-पार किया उनके नाम थे “अनंत, वासूकी, तक्षक, करकोटक और पांचवा ऐरावत” नागपंचमी का संबंध “नाग” इन सांप से न होकर, नाग यह “टोटेम ” पांच पराक्रमी नाग राजाओं से संबंधित है। उनके गणतांत्रिक (Republican) स्वरुप में अनेक स्वतंत्र राज्य अस्तित्व में थे |जिसमें अनंत यह सबसे बड़ा | जम्मू – कश्मीर का अनंतनाग ये शहर उनकी याद की गवाही देता मौजूद है | उसके बाद दूसरे वासुकि नागराज ये कैलास मानसरोवर क्षेत्र के प्रमुख थे | तीसरे नागराजा तक्षक, जिनकी यादगीरी के रूप पाकिस्तान में तक्षशीला है |चौथे नागराजा करकोटक और पांचवें ऐरावत (रावी नदी के पास) | इन पांचों नागराजाओं के गणतांत्रिक राज्य की सीमा एक दूसरे से जुड़ी हुई थी | इस क्षेत्र के लोग इन पांच पराक्रमी राजाओं की याद कायम रहे इसलिए हर साल समारोह आयोजित करते थे, वो नागपंचमी के नाम से जाना जाने लगा | इसका अनुसरण उन राज्य के अन्य प्रांतों के लोगों द्वारा किया गया | इस तरह नागपंचमी का समारोह पूरे देश में मनाया जाने लगा। 





नाग वंशावलियों में 'शेषनाग' को नागों का प्रथम पराक्रमी राजा माना जाता है। शेषनाग को ही 'अनंत' नाम से भी जाना जाता है। नागवंशी नागराजा अनंतनाग नागराजा का साम्राज्य विस्तार जम्मू-काश्मीर में फैला था उसने अपने नाम से ही अनंतनाग शहर बसा कर उस को भी अपनी राजधानी का दर्ज़ा दिया था।

कश्मीर का 'अनंतनाग' इनका गढ़ माना जाता था। कांगड़ा, कुल्लू व कश्मीर सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नागों के वंशज आज वर्तमान समय में भी मौजूद है। उसमे से कुछ नागकुल के लोग झारखंड और छत्तीसगढ़ में आकर बस गए। इसवी सन पूर्व 6 वी शताब्दी मगध साम्राज्य स्थापित हूआ, उसका संस्थापक शिशुनाग यह नागवंशीय नागराजा था। इन सभी नागवंशीय नागराजा जो बुद्ध धम्म के महउपासक, संरक्षक थे आज भी इस बात का भारत का गौरवशाली धम्म इतिहास की साक्ष्य  देते है। शेषनाग को ही 'अनंत' नाम से भी जाना जाता है। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए फिर तक्षक और पिंगला नागवंशी राज घराणों ने अपने अपने नाम से कुल चलाए।

3. वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य करता था।
4. नागवंशी नागराजा तक्षक, जिसने बुद्ध के धम्म का विश्वविद्यालय तक्षकशिला (तक्षशिला पाकिस्थान) का निर्माण किया। तक्षशिला शहर बसाकर अपने नाम से ही 'तक्षक' कुल चलाया था।
उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादी नाम से नागों के वंश हुआ करते थे। भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था। जो नागवंशीय राजकुल कश्मीर में निवास करते थे। बाद में ये सभी नागकुल के लोग झारखंड और छत्तीसगढ़ में आकर बस गए।

5) नागवंशी नागराजा करकोटक (कर्कोटक)
6) नागवंशी ऐरावत नागराजा का रावी नदी के आसपास में उनका शासन रहा।
7. मगध साम्राज्य शिशुनाग
8. वीरसेन नाग, 
9. नरदेव/देव नाग
10. भव नाग, 
11. गणपति नाग,
12.बृहस्पति नाग,


नागवंशीय प्राचीन काल के वंशज राजकुल के नौ नाग राजाओं के जो पुराने सिक्के मिले हैं, उन पर 'बृहस्पति नाग', 'देवनाग', 'गणपति नाग' इत्यादि नाग नाम लिखे प्राप्त हुए हैं । इन नागवंशीय का शासनकाल नागगण विक्रम संवत 150 और 250 के बीच राज्य करते थे।

मथुरा और भरतपुर से लेकर ग्वालियर और उज्जैन तक का भू-भाग नागवंशियों के अधिकार में था। 551 ई. के आस-पास वासुदेव नाग यहाँ का शासक था। इस वंश का उदीयमान शासक हुआ सातवीं शताब्दी में नरदेव हुआ। यह नागवंशी शासक मूलतः बुद्ध के उपासक थे।

नागा आदिवासी' का संबंध भी नागवंशी से ही माना गया है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी नल और नाग वंश तथा वर्धा के फणि-नाग वंशियों का उल्लेख मिलता है। मध्यप्रदेश के विदिशा पर शासन करने वाले नाग वंशीय राजाओं में शेष, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि आदि का उल्लेख मिलता है।



बुद्ध के भूमि पर अनेक नागवंशियों राजाओं ने राज किया है, इसी कारण भारत के कई नगर, शहर और ग्राम 'नाग' शब्द पर आधारित हैं। महाराष्ट्र का नागपुर शहर सर्वप्रथम नागवंशियों ने ही बसाया था। जिसे बाद में गोंड राजा बख्त बुलंद शाह उइका ने नागपुर शहर की स्थापना की। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने नागपुर में धम्म दीक्षा देते वक्त बताया था कि गोंड राजा बख्त बुलंद शाह उइका नागवंशीयों को अपना पूर्वज मानते थे इसलिए उन्होंने नागपुर शहर का नाम नागपुर रखा और वहां की नदी का नाम नाग नदी भी नागवंशियों के कारण ही पड़ा। नागपुर के पास ही प्राचीन नागरधन नामक एक महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक नगर है। नागवंशी के वंशज को मनुवादी प्रतिक्रान्ति में महार जाति में ढकेल दिया गया। महाराट्ठ भाषिक अपभ्रंश हो कर महाराष्ट्र हो गया। महार जाति भी नागवंशियों के वंशज है। प्राचीन समय से ही यह सभी नागवंशीय बुद्ध के उपासक, धम्म संस्कृति के संरक्षक और धम्म प्रचारक थे।

आज भी अनेक धम्म ऐतिहासिक सहित्यों में, प्राचीन दस्तऐवजो में, गुफाओ में, शिलालेखो मे, धातु- लकड़ी - पाषाणों में, और पुरातत्त्वो के उत्खननं में, खोजो में बुद्धिस्ट नाग संस्कृति के महान इतिहास के सबूत संदर्भ के तौर पर मिल रहे है। इस तरह से २५०० सालो से बुद्धिस्ट नागवंशीय लोगो की आइडेंटिफिकेशन (Identification) ऐतिहासिक धम्म साक्ष्य बुद्धमय नाग संस्कृति को उजागर करता है।

नागवंश आज से 2500 साल पहले बुद्ध का अनुयाई था, उन्ही नागवंशियों की संतानें है हम, हमारे पूर्वज बुद्ध को पूजते थे, बुद्ध के अनुयायी नागवंशी होने के कारण, जब पुष्यमित्र शुंग ने आदेश दिया की जो भी बोद्ध भिक्खुओ का सर काट कर लाएगा उसको 100 स्वर्ण मुद्राएं दी जाएगी तब बुद्ध धम्म यहा से समाप्त हुआ और वो दूसरे देशों में जा पहुचा लेकिन बुद्ध की शिक्षाएं हमारे लोगो ने अपने पास हमेशा रखी । वो उन 7 नाग की पूजा करते थे जिनको आज भी नागपंचमी की कहानी के रुप मे भारत के कई हिस्सों में पूजा जाता है । 

नागपंचमी : बौद्ध उत्सव-नागपंचमी का सच

नाग पंच शील का मतलब है, नाग, पंच, शील और उसका उत्सव। नाग पंचमी बौद्धो का उत्सव है जिसे बड़ी चालाकी से कटोरी चोरों ने ओबीसी एससी एसटी की मूर्खता और बेईमानी के कारण चुरा लिया है, नाग पंचमी तब से मनाया जाती है जब से भारत के कोने कोने में नाग वंश के राजाओं ने बौद्ध सभ्यता के प्रति अपना पूरा योगदान दिया इन महान राजाओं के याद में यह दिन मनाया जाता है।

नाग एक जाती थी इसी जाति के नाग लोग भारत के मूल निवासी हैं इन्हें असुर कहा गया। नागवंशी राजा व योद्धाओ मे अनंत, बासुकी, शेष, पदम्, कवल, ककोटिक,अस्तर, शंखपाल,कालिया और पिंगल नागवीर प्रसिद्ध है। भारत में इनका ही वर्चस्व था और यह नाग भगवान बुद्ध के अनुयाई व बौद्ध धर्म के प्रचारक थे। उनका साम्राज्य भारत, यूनान ,मिश्र, चीन, जापान आदि देशों में भी रहा है। नाग वंश के बौद्ध लोग सावन की पंचमी के दिन वार्षिक पंचायत करते थे । यह पंचायत मुखिया का चुनाव के लिए होती थी। इस दिन लोग नहा धोकर अपने आराध्य देव तथागत बुद्ध की वंदना करके सुबह ही गांव के संस्थागार में एकत्र होते थे ।इनका आपसी रहन-सहन समता,एकता,न्याय और भाईचारे पर आधारित था। मुखिया तथा संघ नायक का चुनाव के दौरान प्रत्याशी के योग्यता प्रदर्शन के लिए कई तरह की प्रतियोगिता हुआ करती थी जैसे तलवारबाजी, घुड़सवारी, तीरंदाजी,मल्लयुद्ध आदि। वर्तमान में भी नाग पंचमी के दिन कुश्ती, दंगल कबड्डी, युद्ध कला से संबंधित दौड़, घुड़सवारी, निशानेबाजी आदि वीरता, साहस ,कौशल और शक्ति के प्रदर्शित करने वाले खेलों का आयोजन किया जाता है। इसलिए नाग पंचमी नागों द्वारा चयन किया गया वही दिन है जिस दिन वह अपने सेनापति,मुखिया और किसी श्रेष्ठ पद का चुनाव करते थे। वार्षिक बैठक किया करते थे।


यह दिन नाग वंश के लिए केवल परंपरा और पराक्रम और वीरता दिखाने का ही नहीं था बल्कि इस दिन का महत्व धार्मिक श्रद्धा और समर्पण की दृष्टि से और भी अधिक था क्योंकि इसी दिन आर्य राजा परीक्षित व जन्मेजय द्वारा असंख्य नागों को आग में झोंक कर मार डाला गया था। इससे आर्य व नागों मे संघर्ष बढ गये। तभी से नागों को गुमराह करके उनके क्रोध को शांत करने के लिए उनके नाम की पूजा प्रारम्भ हो गई। यह दिन उन्ही नागों का स्मृति दिवस है । नागवंश की स्त्रियां इसी दिन को नदी, तालाब के किनारे जाकर स्नान कर बोधवृक्ष, स्तूप, चैत्य, गुफा, विहारों आदि बौद्ध प्रतीकों की पूजा करके घर परिवार व समाज के लिए मंगल कामना करती थी। इसी समय घात लगाकर विकृत मानसिकता के लोगों ने इन स्त्रियों की पिटाई तथा बेज्जती की। कालान्तर में सामाजिक जागरूकता के कारण ऐसा कर पाना असंभव हो गया फिर भी इस परंपरा का निर्वाह अपने ही लोग गुड़िया पीटकर करते हैं। बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर 14 अक्टूबर 1956 को अशोक विजयदशमी के दिन 10 लाख लोगों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा के लिए नागपुर को ही चुना क्योंकि नागपुर प्राचीन काल में नागों की भूमि थी और समस्त भारतवंशी नाग शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।


आर्यो ने अपना वर्चस्व कायम करने नागराजा को सांप में परिवर्तित किया। नागवंश के इस पुरामिथकीय सच को ऐतिहासिक रिसर्च की अपेक्षा है। सभी समाज अपने सामाजिक विरासत को लेकर गौरवान्वित होते है। ऐतिहासिक रिसर्च की व्यवस्था करते है। ताकि वे अपने गौरवपूर्ण इतिहास का संरक्षण कर सकें। हम इस दिशा में न सिर्फ पिछड़े हुए है, बल्कि उधार के ऋषियों से स्वयं को महिमा मंडित कर रहे है। ये हमारे लिए घातक है। नागपंचमी अब सांपों की पंचमी हो गई और नागवंशीओं की पंचमी लुप्त हो गई। बावजूद इसके आज भी हम लोग घर की दीवारों पर पांच नाग बनाना भूले नहीं | ये पांच नाग ही हमारे पूर्व के नागराजा है। धार्मिक परिसीमा से बाहर निकल कर नागपंचमी के त्यौहार का महत्व नागवंशीओ को जान लेना चाहिए। नमो बुद्धाय जय भीम

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